सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गोंड लोग किस देव (भगवान) को मानते हैं| कोयापुनेर का विस्तार कैसे हुआ|


गोंडवाना समाज का भगवान कौन है? 

 

गोडी कुपारी लिंग

कोया पुनेम तत्व ज्ञान 

सागा (विभग गोत्रज समाज), 

गोटुल (संस्कृति, शिक्षा केंद्र),

पेनकड़ा (देव स्थल, ठाना), 

पुनेम (धर्म) 

मुठवा (धर्म गुरु, गुरु) 


यह पांच वंदनीय और पूज्यनीय धर्म तत्व हैं। इनमे से किसी एक की कमी को पूरी तरह से तैयार किया गया है। मुठवा भट्टी कुपारी लिंगों ने अपने साकृत निरमल पारिश्रमिक मानव समाज से आदि वंशागत सामाजिक जीवन का व्यवसाय, सगायुक्त सामाजिक जीवन के लिए उपयुक्त व्यक्तित्व, नववंशीय निर्माण के कार्य से लेकर कुएं लिंगों को जन्म दिया गो टूटू इंस्टिट्यूशन की स्थापना की स्थापना की गई गोटूल, यह गो + गोगो भी अच्छी तरह से संतुलित है। "तुलु" मतलब थिया, जगह,स्थल इस प्रकार गोटुल का मतलब गोंगोठाना (विद्या स्थल, ज्ञान स्थल) है।


https://www.blogger.com/blog/post/edit/preview/2476057524748998081/98644766870577181

काल में गोंडवाँ के रहने वाले गोंड वहा गोटुल संस्थान विद्दमान थे। फिर भी वे किसी भी व्यक्ति से संपर्क करते हैं। गो को अलग-अलग अलग-अलग हिस्सों में विभाजित किया जाता है जैसे- भूईं गोंडि 'धंगर बस्से' (धंगर मतलब विद्या, बैसर्स मतलब स्थल), गान्या गोंडि 'गिप्रो' (गिती मतलब ज्ञान, प्रोरा मतलब घर), और उराँव गोंड इसे 'दूम कुरिया' (दूम मतलब विद्या, कुरिया) मतलब परीक्षा का स्थान, घर आदि। गोटूल शिक्षा संस्थान की स्थापना के लिए उपयुक्त शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान की शुरुआत के लिए उपयुक्त होगा। इस पर से अंको के कोया पुनीम तत्वज्ञान में ज्ञान को चिह्नित किया गया है, इस विषय पर जानकारी को शामिल किया गया है।

गोंडवाँ गुणन में मिलते हैं, कि माता रतनो के अनाथ देवता में गुणी गुण गुणी होते हैं और माता कली के गुण गुणी होते हैं, छत्रछाया में पल में अपग्रेड होते हैं। खराब कर दिया गया। गुफ़े के ढा को एक विशाल से बंद कर दिया गया। यह स्टैग महादेव की संगीत मंत्र से पूरित था। इसे गड्ढा के शीर्ष में मौसम खराब था और मौसम में भी ऐसा ही है।


 गुफा के अंदर से उन बच्चों का इस छिद्र के द्वार से निकल पाना संभव नही था। इसी छिद्र से उन बच्चों को माताओं के द्वारा भोजन पहुचाया जाता था। वर्षों तक बच्चे गुफा में ही बंद रहे। बच्चों के बिना माताओं (माता रायतार जंगो और माता कली कंकाली) का हाल बेहाल होने लगा। उनहोंने बच्चों को मुक्त करने के लिए महादेव से कई बार निवेदन किए, किन्तु महादेव ने उन्हें मुक्त करने में असमर्थता जताया। उधर बच्चों के बिना माता रायतार जंगो तथा माता कली कंकाली का मातृत्व ह्रदय और शरीर जीर्ण-क्षीण होने लगा था। माताओं की इस अवस्था को देखकर महादेव को दया भाव जागृत हुआ और वे उन बच्चों को गुफा से मुक्त किए जाने का मार्ग बताया। इसे कोई महान संगीतज्ञ ही खोल सकता है, जो दसों भुवनों और प्रकृति के चर-आचार, जीव-निर्जीव, तरल-ठोस सभी तत्वों की आवाज का ज्ञाता हो, संगीत विज्ञानी हो तथा उन आवाजो का लय बजा सकता हो या पूरी सृष्टि की लय जिसका संगीत हो। यह सुनकर माताओं के लिए दूसरी संकट खडी हो गई। महादेव ने ध्यान से आँखें खोलते हुए कहा- वह महामानव, संगीतज्ञ इस संसार में आ चुका है। केवल वही इस गुफा के द्वार का चट्टान अपनी संगीत विद्या की शक्ति से हटा सकता है।


माताएं महादेव के बताए मार्ग अनुसार उसे ढूँढने निकल पड़ीं और 'हीरासूका पाटालीर' के रूप में उसे पाया। महादेव की आज्ञा से हीरासूका पाटालीर ने अपने संगीत साधना से महादेव के द्वारा गुफा के द्वार पर बंद की गई मंत्र साधित चट्टान को हटा दिया। चट्टान के हटने और लुड़कने से उसमे दबकर हीरासूका पाटालीर की मृत्यु हो गई। उस संगीत विज्ञानी का यहीं अंत हो गया। बच्चे गुफा से मुक्त हो गए। अब महादेव और माताओं को बच्चों की भविष्य की चिंता सताने लगी। सभी मंडून्द कोट बच्चे केवल मांस के लोथड़े भर थे, उन्हें किसी भी तरह का सांसारिक व सांस्कारिक ज्ञान नही था। महादेव को मालूम था कि पेंकमेढ़ी सतपुड़ा पर्वत माला पर एक महान दार्शनिक, प्रकृति विज्ञानी पहांदी पारी कुपार लिंगो उनकी आज्ञा से गहन प्राकृतिक ज्ञान, धर्म की शोध-खोज, ध्यान, योग में जुटा हुआ है। 


वह ज्ञानी पुरुष ही इन बच्चों को जीवन ज्ञान से प्रकाशित कर सकता है। महादेव स्वयं उनकी खोज में निकल गए। सुबह-सुबह ही महादेव पहंदी पारी कुपार लिंगो के साधना स्थल, उस पर्वत पर स्थित विशालकाय पेड़ के नीचे पहुच गए। इस एकांत निर्जन स्थान पर लिंगो लगभग 7 वर्षों से गहन आध्यात्मिक शोध में जुटे हुए थे। वे उस समय भी ध्यानमग्न थे। महादेव उनकी तंद्रा तोडनी चाही। उनकी तंद्रा टूटी किन्तु वे महादेव को देखकर भी उनके शरीर में हल-चल, जरा भी विचलन नही हुआ। महादेव उनके मन में उत्पन हल-चल को समझ रहे थे। पहंदी पारी कुपार लिंगो को उसी समय अंतर्ज्ञान की प्राप्ती हुई थी। अंतर्ज्ञान की प्राप्ति होते ही उसे अंतर्ज्ञान से एक स्त्री के ऊपर बिजली गिरने से उसकी मौत का समाचार उसे मिल चुका था। एक स्त्री की मौत का ज्ञान दर्शन होना उसे आश्चर्य कर दिया था, कि यह दृश्य उसे कैसे दिखाई दिया ! जिसके कारण वे महादेव की आवाज को ग्रहण और सुन नही पाए। महादेव उनकी मनःस्थिति को जान गए थे।


 महादेव ने लिंगो से कहा- जो तुमने अंतर्ज्ञान में दिखाई दिया, वह सत्य है पारी कुपार ! अब तुम्हे अंतर्ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी है। एका एक महादेव का वचन सुनते ही लिंगो की तंद्रा टूटी और वे महादेव को समक्ष में देखकर विचलित होकर खड़े हो गए। वह महादेव से जानना चाहा कि ऐसा क्यों हुआ और वह स्त्री कौन थी। महादेव ने कहा कि यह तुम अब सब कुछ जानने लगे हो, मेरे द्वारा अब यह बताने की आवश्यकता नही है। महादेव ने उन्हें उनके पास आने का कारण बताया और पारी कुपार लिंगो को अपने साथ ले गए।


पहंदी पारी कुपार लिंगो को जो दृश्य उनके अंतर्ज्ञान में दिखाई दिया था, वह विकट दृश्य माता कली कंकाली की मृत्यु का समाचार था। बताया जाता है कि माता अपने आश्रम के पास के विशालकाय बरगद के नीचे काम कर रही थी। अचानक आसमान पर बिजली कौंधी और उस बरगद के झाड़ पर आसमानी बिजली गिरी। इस आसमानी बिजली से कली कंकाली माता की मृत्यु हो गई।


 इस समय लोहगढ़, कचारगढ़ के उस स्थान पर बरगद पेड़ का कोई नामोनिशान नही है, किन्तु वहीँ पर कली कंकाली माता की मढ़िया हमारे पूर्वजों नें स्थापित कर दिया है। इस मढ़िया में समाज के भूमका-पुजारियों द्वारा सतत कोया मुनेमी रीति रिवाज से पूजा अर्चना की जाती है तथा माता जी के दर्शन के लिए देश के ओर-छोर से श्रद्धालु हर दिन मढ़िया में जाते रहते हैं। प्रतिवर्ष इस स्थान पर माघ पूर्णीमा में विशाल मेला भरता है। यह मेला पूर्णिमा के 4 दिन पहले से शुरू होकर पूर्णिमा के दिन समाप्त हो जाता है। देश भर से लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहाँ आते हैं और गढ़ माता की मढ़िया, कली कंकाली मई की मढ़िया, जंगो माई, लिंगो कुटी, बड़ादेव गुफा, बड़ा गुफा (जहां मंडून्द कोट बच्चो को बंद किया गया था) आदि का दर्शन कर कोया पुनेम का बीज मंत्र लेकर चले जाते हैं।


मंडून्द कोट बच्चों को कोयली कचारगढ़ गुफा से मुक्त कर उन्हें उचित शिक्षा प्रदान करने के लिए कुपार लिंगो ने सर्वप्रथम 'गोटूल' नामक शिक्षा केन्द्र की स्थापना एकांतमय, शांतिपूर्ण वातावरण से शुरू की पारी कुपार लिंगो ने उन मंडून्द कोट बच्चों का मानसिक, शारीरिक विकास किया। उन्हें सगा सामाजिक एवं धार्मिक शिक्षा दी। तत्पश्चात उन्ही के माध्यम से सम्पूर्ण कोयावंशीय मानव समुदाय में गोटूल संस्थाओं का निर्माण कराया गया। पारी कुपार लिंगो के मतानुसार छोटे बच्चो पर जन्म से ही माता-पिता के संस्कार आ जाते हैं। अच्छे-बुरे लोगों की संगत का प्रभाव उनपर होता है। हम जहां कहीं, जिस जगह में रहते हैं, उस पर्यावरण से हमारा जीवन प्रभावित होता है। 


यदि निवास स्थान के पास झगड़ा-फसाद करने वाले लोग रहते हैं, तो उसी वातावरण में लोगों के विचार व्यवहार प्रभावित होते हैं। अंत में उसी के मुताबिक वह अपना व्यवहार करता है। ऐसे अंधकारमय वातावरण में रहकर मनुष्य को "सुयमोद वेरची तिरेप" अर्थात सद्ज्ञान प्रकाश किरण का दर्शन नही हो पाता मानव जीवन की मौलिकता इस अज्ञानता के पर्यावरण में फंस जाने से लुप्त हो जाती है। मनुष्य अपने वास्तविक रूप एवं स्वहित को देखने में असमर्थ हो जाता है। उसकी वैचारिक एवं बौद्धिक शक्ति कमजोर हो जाती है।


पारी कुपार लिंगो ने इसीलिए अपने सगा शिष्यों के माध्यम से सम्पूर्ण कोयावंशीय मानव समाज की "नार उंडे गोटूल" अर्थात ग्राम एवं गोटूल संस्थाओं की स्थापना किस स्थल पर और कैसे पर्यावरण में करना चाहिए, इस बारे में अपने बौद्धिक ज्ञान प्रकाश के बल से निम्न "नार गोटूल" मंत्र दिया है, जिसे "मूठ लिंगो मंतेर" कहा जाता है और जिसका प्रपठन शुभ मंगल बेला के अवसर पर वर-वधुओं को आशीर्वाद देते वक्त सगा भूमका द्वारा किया जाता है :-


"बेगा चिड़ीचाप कमेकान अलोट,

फव्व वड़ीकुसारता ठीया आयात |

ताल्कानूंग दाय पुटसीनकून बेगा,

मान मति छन्नो आया पर्रीन्ता |

अदे ठीया ते नार उचिहतोना,

उंडे सगा बिडार गोटूल दोहताना |


          अर्थात जहां एकांतमय, शांतिपूर्ण वातावरण हो, जो अपने वास्तविक सुख संपदा के लिए उचित एवं अनुकूल हो, जहां अपने वैचारिक शक्ति को प्रेरणा मिलती हो, ऐसे शांतिपूर्ण वातावरण में ग्राम बसाना चाहिए एवं गोटूल संस्था की प्रतिस्थापना करनी चाहिए. गोंड समाज में आज जहां-जहां भी गोटूल संस्थाएं विद्दमान हैं वे सभी एकांतमय शांत वातावरण में ग्रामों के मध्य ही प्रतिस्थापित हैं तथा उनमे जो बच्चे रहते हैं, वे ग्रामवासियों के सामाजिक जीवन में जो बुराईयां होती हैं, उनसे परे रहते हैं। गोटूल प्रमुखों का कर्तव्य क्या होता है, इस बारे में जानकारी हमें "कंकाली सुमरी मंतेर" से प्राप्त होती है, जिसका प्रपठन गोटूल माता कली कंकाली की पूजा करते वक्त सगा भूमका अर्थात गोटूल प्रमुख द्वारा किया जाता है :-


"कयक साहचो आसरो सिम कंकाली आयनी,

कोड़ाते बिया छव्वानूंग नीवा कलीया दाईनी |

मतिय, मेंदोल, मोद्दूर, पुनेमता मुन्सार किम,

सगा बिड़ारता पुयनेंग सुयताकत्ता सर्री सिम |"



          उक्त "कली कंकाली सुमरी मंतेर" में  कली कंकालीन माता से यह प्रार्थना की जाती है कि हे कली कंकाली माता ! हाथ बढ़ाकर हमें आशीर्वाद दीजिए, हम तुम्हारे बालक हैं, हमें अपनी गोद में लीजिए. हमारा मानसिक, शारीरिक एवं बौद्धिक विकास कार्य में मदद कीजिए तथा हमें सगा धर्म, सगा नीति एवं सत्य मार्ग दिखाईए। इस पर से यह सिद्ध होता है कि उम्र के 3 वर्ष से लेकर अठारह वर्ष तक सगा समाज के जो बच्चे गोटूल में रहते हैं, वहाँ उनका मानसिक, शारीरिक एवं बौद्धिक विकास करने का कार्य किया जाता है. साथ ही उन्हें सगा सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक मूल्यों का परिपाठ भी पढ़ाया जाता है. जिससे वे सगा समाज के उचित एवं होनहार घटक बन सकें।



          मनुष्य जब जन्म लेता है तब वह एक मांस का लोथड़ा मात्र होता है। "मति उंडे मोद्दूर" अर्थात शारीरिक विकास में विकास करने के लिए गोटूल संस्थान में ही जा सकता है, यय पुनीमी सार्टुका में: -


"लोंदा लाका उंडी रवांठू माता,

मानव जीवा पेस्टसी ख्यातनाता |

मति, मद्दूर, कमोक धमक चोलाता,

मुन्सार सगा गोटुलते नेटा |

परोल मूंद सावरीिनोर कांडना,

सगागोल वैटसी सिआना |


वरद सार्ट के द्वारा गोंडका के गोंड का भी गोंड का कार्यक्रम है, महामाता माता-पिताओं को 'सगा के' (ग्राम माता-पिता के दैवीय कल्पित खेल "तुम्हारे बच्चे के मांस का खेल" है, पर्यावरण के लिए उपयुक्त शिक्षा के लिए 3 साल के बाद गोल में झूठ बोलना।


          स्थाई रूप से विकसित होने पर उसे स्थायी बना दिया गया। पुराने जमाने में गोटूल संस्थाएं विद्दमान संस्थाएं थीं, अणमे का मनोमय विकास के लिए साध्य-विचार, कल्पना, फीचर, युवा का कार्य गोलू में किया गया था। बौद्धिक विकास के लिए, शक्ति, शक्ति, शक्ति, शक्ति आदि गुणग्राही का विकास होगा। अतिरिक्त शारीरिक विकास शारीरिक विकास के लिए खेलकूद, तीरकमान, मल्ल, मु, लाठी-काटी विधाओं का प्रशिक्षण था। इस प्रकार, मानसिक मानसिक विकास के मानसिक विकास के साथ मानसिक रूप से सक्षम मानसिक रचना का पाठ किया गया। सगा समाज के स्वास्थ्य स्वस्थ रहने वाले जी, इसलिए


          इस तरह के पनीमुठवा पबई कूपर पेनो की शिक्षा के लिए गोटोफोन में उपयुक्त शिक्षा दी गई थी। सगा सोसाइटी के इष्ट और अद्यतन जीवन के बारे में जानकारी दी गई। स में गोल की शिक्षा से सुशील, सुभाव, पूर्ण विशेष था। गोटू के सहजीवन से वह कोया पुनीम तत्व ज्ञान का अंतिम लक्ष्य "जय सेवा" मंत्र का अधिष्ठाता बन गया था। मस्तिष्क मनोविकार में स्वस्थ भोजन करते हैं।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा: इतिहास, रहस्य और आदिवासी परंपरा की पूरी सच्चाई Danteshwari Temple Dantewada: History, Mystery and the Truth of Tribal Tradition

दंतेश्वरी मंदिर: आस्था, इतिहास और आदिवासी संस्कृति का संगम छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के दंतेवाड़ा जिले में स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर भारत के सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, गोंडवाना परंपरा और बस्तर की ऐतिहासिक पहचान का केंद्र भी है। यहां शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर स्थित यह मंदिर आध्यात्मिक ऊर्जा, प्राकृतिक शक्ति और सांस्कृतिक विरासत का अनोखा संगम प्रस्तुत करता है। दंतेश्वरी मंदिर का इतिहास दंतेश्वरी मंदिर का निर्माण लगभग 14वीं शताब्दी में बस्तर के काकतीय शासकों द्वारा कराया गया था। माना जाता है कि जब काकतीय वंश के राजा वारंगल से बस्तर आए, तो वे अपनी कुलदेवी दंतेश्वरी को भी साथ लाए। शक्ति पीठ से संबंध पुराणों के अनुसार: माता सती के शरीर के अंग जहां-जहां गिरे, वहां शक्ति पीठ बने। दंतेवाड़ा में माता का दांत (दंत) गिरा था। इसी कारण इस स्थान का नाम पड़ा – दंतेवाड़ा और देवी का नाम हुआ दंतेश्वरी। यह मंदिर आज भी बस्तर राजपरिवार की कुलदेवी के रूप में पूजित है। --- आदिवासी आस्था और गोंडवाना संब...

आदिवासी होली कैसे मनाते है? आदिवासियों का होली के बारे में क्या मान्यता है? Tribal Holi celebration in India

  आदिवासी होली कैसे मनाते है ? इतिहास एक ऐसा सच है जो हमने कभी देखा नहीं है लेकिन यह चीज हमें स्वीकार नी पड़ती है। इतिहास हमें अपने जीवन में बहुत कुछ सिखाता है और भविष्य की कल्पना करने में मदद करता है। वैसे ही कुछ हम आपको पुराना इतिहास बताते हैं जो करोड़ों साल पुराना है। वैसे तो हम अपनी भारतीय संस्कृति के अनुसार होलिका को जलाते भी है और अगले दिन होली खेलते भी है। लेकिन यहां   हमारे आदिवासियों में मान्यता अलग हैं। आज आप जानेंगे कि आदिवासी होली कैसे मनाते हैं? होली के बारे में आदिवासियों की विचारधारा आज हम आपको होली त्योहार से जुड़ी आदिवासियों की विचारसरणी के बारे में बताएंगे। कुछ आदिवासियों का मानना है कि होली जलाना भी बहुत बड़ा पाप है! शायद आपको यह जानकर हैरानी होगी और यह लेखन भी बहुत ही खास है की आदिवासी होली कैसे मनाते हैं? भारत के अंदर कई सारे ऐसे आदिवासी है जो आज भी अपने कोयातुर समाज के विधि-विधान का पालन करते हुए। आज भी होली पर्व मनाते है। लेकिन आज के समय में जिस प्रकार से होली के बारे में कथा कहानी में बताया व पढ़ाया जाता है। इस प्रकार कदापि नही है। क्योंकि जब से हम...

गोंडी व्याकरण, गोडवाना भाषा सिखें|

जय सेवा सागा जनो ,       कुछोडों सैल प्रथम पृथ्वी का निर्माण हुआ, जो आगे चलने दो महाद्वीप में हुआ था, जैसा दो महाप्रलय का निर्माण, एक था यूरेशिया और दूसरा था गोंडवान महाप्रलय ये जो गोंडवाँ महाप्रपात एक महाप्रलय था| यह प्राचीन काल के प्राचीन महाप्रलय पैंजिया का दक्षिणी था| उत्तरी भाग के बारे में यह बताया गया| भारत के महाद्वीप के आलावा में महाद्वीप गो और महाद्वीप, जो मौसम में उत्तर में है, का उद्गम स्थल| आज से 13 करोड़ साल पहले गोंडवांस के वायुमंडलीय तूफान, अंटार्टिका, अफ़्रीका और दक्षिणी महाप्रलय का निर्माण |       गोंडवाना नाम नर्मदा नदी के दक्षिण में प्राचीन गोंड राज्य से व्युत्प्न्न है, गोंडवाना नाम का सबसे पहला विज्ञान है | से गोंडिय़ों की भाषा का उद्गम था|          गोंडी भाषा में भारत के एक बड़े आकार का है| जैसा आज की दुनिया में लागू होने वाली भाषा के साथ लागू होने वाली भाषा में जलवायु परिवर्तन की भाषा पर लागू होता है, अगर कोई वैरिएंट दुनिया में लागू होता है, तो संस्कृति, सभ्यता, भाषा, धर्म, कुछ भी लागू होता है| भाषा शब्द शब्द क...