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मूल निवासी, आदिवासी, गोडंवानी (कोयतुर) संस्कृति के मुख्य तत्व जो प्रथा एवं परंपरा की जानकारी

मूल निवासी, आदिवासी, गोडंवानी (कोयतुर) संस्कृति के मुख्य तत्व जो प्रथा एवं परंपरा मे विद्यान है।




पृथ्वी की उत्पत्ति - प्रकृति की देन जो कि खगोलिय चुमबकीय गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा अपने कक्ष पर नाँचे से दाये अर्थात घड़ी की सूई के विपरित दिशा में (Anti clock vise) घुम रही है।


मानव की उत्पत्ति एवं मूल निवास- प्रकृति शक्ति, पंच महाभूत, पूना उन्ना(सल्ला-गागरा) शक्ति प्रथम, जेष्ठ, दाऊ-दाई(फरावेन-सईलांगर) की कोख से 35 करोड़ वर्ष पूर्व फड़ाकलडूबहिम महापरलय) के समय के समय सिरडीसिंगार द्वीप से उत्पत्ति, निवास स्थान कोयामुरी, सुनुनु द्रीप, सयुंगार द्वीप, गंडो द्रीप जिसे ट्रायेजिक युय में गोडवाना लैण्ड कहा जाता था । जहाँ बाद में आगंतुकों ने वहाँ के मूल निवासियों को मूलनिवासी, द्रविड आदिवासी, हरिजन, बहुजन संबोधित किया। गोंडवाना लेण्ड उष्ण प्रदेश था।


संबोधन

गणडवेन, गण्डजीव, गॉँड, दैबीर, कोया, कोयतूर


युग पुरुष-

शंभुशेक(महादेवों) की 88 पीढ़ी, पाहीदी पारी कुपार लिंगो रक्षेन्द्र राज दशानन ।


युग माता- 

कली कंकाली , रायताड़ जंगो, 88 शंभुओं की रानी (गौरा दाई नस्ल-रंग-ग्रेनाइट, स्लेटी (सांवला -कला) कद्- साधारण , नाटापन, गठीला बदन,

बाल- छोटे घुंघरालें, नाक- चपटी, बड़ी,


सामाजिक व्यवस्था

प्रकृति वादी नियमों एवं सिद्धांतों पर आधारित गोंदोलाई व्यवस्था (रीति-नीति, प्रथा-परंपरा, अलिखित)


आस्था के प्रतीक

देवी, देवता, निराकर स्वरुप।


उपासना स्थल

कुल देवालय (वंशाभिड़ी), ग्राम देवालय , गढ़ देवालय , कोट देवालय में केवल विशेष नियत तिथियों में देव कार्य।


सर्वोच्चय शक्ति

प्रकृति शक्ति-पंच महाभूत जिसे कोयतुर पितु शक्तिए एवं मातशक्ति प्ना


उन्ना) संल्ला-गांगरा) के रूप में देवाधिदेव बड़ा देव के रुम में पूजत है। कुल का प्रमुख देवी एवं देवता


गोंदोलाई व्यवस्था के अनुसार निर्धारित गोत्र के कुल का प्रथम पिता को उस कुल का बुढ़ा देव एवं उसक कुल की प्रथम माता जिससे उस कल के बच्चो की उत्पत्ति हुई उसे बुढ़ी माई माना जाता है।


कुल/वंश की पहचान -

 निर्धारित गोत्र, गोत्र उत्त्ति ढ़ गत् निह्ह, वंश टोटम, गोत्र बाना, निर्धारित संख्या में देवी देवता एवं निर्धारित गंग का ध्वज एवं फोटा (पगड़ी) होता है।


प्रमुख आराध्य देव-

 बड़ा देव, बुढा देव, दुल्हा दे, ठाकुर देव, लिंगो देव, करिया धुर्वा देव, नराईन देव, सांहड़ा देव, नागदेव।


1 बड़ा देव -

गोन्डी पुनेमी एवं गोन्डीगाथा के अनुसार सम्पूर्ण आदिवासी समुदाय देव संस्कृति का ध्योतक है। आदिवासियों के देवों का मूखिया "बड़ादेव है। वह श्रष्टि चिंतक है। देवों का देव बड़ादेव है, व निराकार व अजन्मा है। वह सर्वेच्च शाक्तिमान है, वह त्वों के उत्पत्किकरत है, वह कण-कण में विराजमान है, उसका साक्षात्कार देवों से होता है। वह प्रकृति के सभी शक्तियों से बड़ा है.

इस पुकराल एवं श्रष्टि में बड़ादेव से बड़ा कोई देव/शक्ति नहीं हैं।


गोड आदिवासी समाज गोंडी में बड़ादेव को 'सल्ले-गंगरा' शक्ति के नाम से स्तुति/सुमरन करता है, जिसका मतलब "धन एवं ऋण शक्ति से है इसी धनात्मक एवं ऋणात्मक शक्ति के जागुत/संयोग के कारण श्रष्टि के स्वरुप का निर्माण हुआ तथा इसी शक्ति के कारण ही श्रष्टि के समस्त संसाधनों का निर्माण, गुह-नक्षत्रों के संचलन की गति निर्धारित हई।

 उदाहरण स्वरुप 

चुम्बक मैं समाहित धन एवं क्रण शक्ति को मान सकते हैं, चम्बक के धन एवं त्रण शक्ति मं आकर्षण एवं प्रतिकर्षण होता है. यही आकर्षण एवं प्रतिकर्षण शक्ति ही गुरुत्वार्षण शक्ति है जो सम्पुर्णकाल में व्याप्त है। इसे उत्पत्ति व विनाश की शक्ति भी कहते हैं।


सल्ले-गंगरा की शक्ति पुर्वकाल के समस्त भौतिक-अभौतिक, चर-अचर,


जीव-निर्जीव, ठोस-तरल सभी में व्यापक रूप से विद्दमान है. सल्ले-गंगरा शाक्ति अर्थात "धन एवं ऋण" शक्ति ही "नर एवं मादा'"शक्तियां हैं, जिनके मातृत्व एंव पितृत्व गुणों से संतती उत्पन्न होते हैं। अर्थात उत्पत्ति की शक्ति ही सल्ले गंगरा या बड़देव है, संसाधनों की उत्पत्ति एवं अंत तथा जिवों का जन्म एवं मृत्यु प्रकृति के चक्रण का नियम है। जिसे हम जीवन चक्र या विज्ञान की भाषा में परिस्थितिक अथवा परिस्थितिकी तंत्र कहते हैं, अतः सृष्टि की उत्पत्ति एवं विनाश का स्वरूप तथा संपूर्ण पूर्वकाल की अनंत धन एवं ऋण शक्ति अथवा पितृत्व एवं मातृत्व शक्ति का ध्योतक बड़ादेव है।


बुढ़ा देव - 

देखने और सुनने में आता है की आदिवासी जन बड़ादेव और बुढ़ादेव को एक ही देव मान लेते हैं, बड़ादेव और बुढ़ादेव के ज्ञान, मान्यता और महत्ता मे बहुत बड़ा फर्क है। मानव में एक ही अंग की कमी/फर्क के कारण समाज उसे पुरुष नहीं मानता, उसी प्रकार बड़ा देव और बुढ़ा देव के स्थायित्व सांस्कारिक और अध्यात्मिक दर्शन में बहुत बड़ा फर्क है। बड़ादेव के संबंध में पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है। बड़ादेव आदि और अनंत शक्ति का ध्योतक है। जिसकी शक्ति का कोई सीमा नहीं। वह निराकार, सर्वशक्तिमान एम सर्वव्यापी है। वह पूर्वकाल सृष्टि के रचयिता है।

वह कण-कण में विराजमान हैं। देव देवियों पूर्वकाल सृष्टि एवं शरीर के प्रत्येक कण के अंत में बड़ादेव की शक्ति व्याप्त है। बड़ा देव से बड़ा और कोई देव/ईश्वर नहीं है। हमें बड़ा देव और बुढ़ा देव मैं अंतर को समझना होगा, अन्यथा हम अपने आने वाली पीढ़ी को इन की संरचना/स्थायित्व संस्कारित महत्व और अध्यात्मिक दर्शन का हस्तांतरण नहीं कर पाएंगे।

आदिवासियों की परंपरा अनुसार बूढ़ादेव सभी गोत्र/कुल/पुरखा/कुनबा का देव है, इससे प्रतीत के रूप में सिर्फ साजा झाड़ के मूल में स्थापित किया जाता है। सवाल अब यहां भी उठता है कि इसे साजा झाड़ में ही स्थापित क्यों किया जाता है, अन्य झाड़ों में क्यों नहीं? इसे घर में क्यों स्थापित नहीं किया जाता? उपरोक्त के संबंध में समाज की प्राकृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक दर्शनों की मान्यता है,की साजा का झाड़ तूफान बारिश भूमि कटाव की स्थिति में भी उसके जड़ अतिमजबूती से जमीन को जकड़े रखते हैं, जो उसकी हर कठिनाइयों की स्थिति में भी अधिकता और ठहराव की निशानी है,इसके मोटे बड़े आकार के पत्ते धूप और बारिश से भी जमीन का संरक्षण करते हैं इसके फल दुनिया के नक्शे की बनाई गई अंडाकार द्विध्रुवीय आकृति के समान दिखाई देता है। इस फल में ऊध्र्वाकार 5 कोर/धारिया विकसित होते हैं, इन पांच कोरो/धारियों के बनावट और संख्या में सृष्टि की पंचतत्व, गोंडवाना के 5 खंड भूभाग के सत्व-तत्व का दर्शन मिलता है। जो सृष्टि की उत्पत्ति जीवनचक्रण एवं जैवीकीय परिस्थितिकी के लिए पूर्ण है। इसलिए इसे सजा झाड़ के मूल में स्थापित किया जाता है। वर्तमान में वनों के विनाश और साझा झाड़ की उपलब्धता की कमी के कारण महुआ आदि शहरों में भी स्थापित किए जाते हैं।

            दूसरी मान्यता यहां है कि ऐसे आदिवासी जन घर पर ही बुढ़ादेव को स्थापित कर विधान पूर्वक पूजा करते थे। उसे भोग चढ़ाते थे, देवताओं के भोग और परिवार के लिए भोजन आज भी घर की मातृशक्ति ही तैयार करती है। तैयार भोजन सबसे पहले देवताओं को अर्पित किया जाता है, एक बार बूढ़ादेव के पूजा के दिन खाना बनाने वाले मातृशक्ति ऋतुचक्र (मासिक चक्र) शुरू हो गया। उन्हें इस समयावधि का ध्यान ही नहीं रहा, भोजन बन चुका था अब भोग लगाया जाताउसके पहले बूढ़ादेव को इस तथ्य का अंतर्ज्ञान हो जाने के कारण वे भूखे कार्य से लोगों का ध्यान हटाने के लिए घर से बाहर चले गए लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि बूढ़ादेव घर से बाहर क्यों चले गए परिवार स्कूल कुनबा के लोगों ने उन्हें समझाने का प्रयास किया परंतु अंततः वह घर वापस नहीं आए और पास में स्थित साजा झाड़ के नीचे बैठकर लोगों की सृष्टि में अंश श्रृजन के पूर्व प्रक्रिया (मातृशक्ति रितु परिवर्तन की मानव संस्कारित जीवन में महत्ता)/घटना चक्र पर सार्थक उपदेश दिया,तभी से बूढ़ादेव को घर के बाहर साझा झाड़ के नीचे ही भोग लगाया जाता है।इस घटना और उनके उपदेशों के पश्चात 

बूढ़ादेव के भोग तथा को नंबर को खाना खिलाने के लिए पुरुष ही खाना बनाते हैं मातृशक्ति या नहीं आज भी गोंड आदिवासी समाज में मात्र शक्तियां ऋतु परिवर्तन की समयावधि तक भोजन नहीं बनाती, रसोई और पेन-पाठा में भी प्रवेश नहीं करती। मात्र शक्तियों में ऋतु परिवर्तन की प्रक्रिया 3-5 दिन में पूरी होती है। इस अवधि में घर के पुरुष सदस्य या दूसरे सदस्य खाना बनाते हैं, इस अवधि तक परिवार के प्रधान सदस्य किसी दूसरे कुनबे या परिवार के शुभ कार्य में शामिल नहीं होते, इस अवधि में ब्रम्हचर्य का पालन किया जाता है।

       गोत्र सदाबहार कुलदेव बूढ़ादेव की स्थापना के पूर्व निश्चित स्थान पर विधान पूर्वक साझा का पौधा रोपण किया जाता है, या प्राकृतिक रूप से विकसित पौधों को चिन्हांकित कर लिया जाता है। उसके पश्चात धार्मिक विधि-विधान से बूढ़ादेव को स्थापित किया जाता है।बुढ़ा देव स्थापित सजा के झाड़/पेड़ को किसी भी रूप से नुकसान पहुंचाना या काटना पूर्ण रूप से वर्जित है। यदि कोई जानबूझ के उसे नुकसान पहुंचाता है या काटता है तो उसे जीवन में भारी कलर्स का सामना करना पड़ता है आज भी इस बात की सत्यता को झुठलाया नहीं जा सकता।

        आदिवासी जनों की मान्यता है कि इस देव परंपरा/संस्कृति मे बूढ़ादेव उनके कुल/गोत्र कुनबा का पहले व्यक्ति हैं, जो बूढ़ा होकर अपना भौतिक देह त्याग चुका है। उसकी जीवात्मा को अपने कुल/कुनबा/पूर्वज/देव के रूप में साजा के झाड़ के मुल मे स्थापित कर दिया गया।उस पहले व्यक्ति से लेकर अब तक अपने भौतिक स्वरूप को त्यागने वाले कुल कुटुंब परिवार के प्रत्येक सदस्य की जीवात्मा को धार्मिक विधि-विधान पूर्वक स्थापित कर दिया गया है एवं यहां निरंतरता अनंत काल तक चलती रहेगी।


        गोंड आदिवासी के कुल-गोत्र/कुनबा/कुटुंबवार अलग-अलग बूढ़ादेव स्थापित किए जाते हैं, किंतु पूजा विधि-विधान विधान समान होता है। गोत्र एवं देव सगा संख्या अनुसार आत्माओं को भोग दिया जाने हेतु साजा के पत्तों में हिस्से रखकर उन्हें सुमिरन करते हुए सभी हिस्सों से 5-5 निवाले अर्पित किए जाते हैं।इस देव सगा संख्या के आधार पर गोत्र अनुसार परिवार को अपने ही गोत्र/कुल/कुटुंब के अन्य स्थान पर रखने वाले परिवार/कुल/गोत्र सगा के बूढ़ादेव में अपने पूर्वजों को शामिल कर सकता है, बशर्ते वह उसी कुल/गोत्र देवसंख्या का सगा हो।

जैसे परतेती गोत्र का पांच देव सगा दुनिया के किसी अन्य स्थान पर रहने वाले परतेती गोत्र वाले पांच देव सगा के बूढ़ादेव पेनठाना में शामिल होकर अपने परिवार के पूर्वजों को विधान पूर्वक शामिल कर सकता है।

पूर्व के देवगढ़ गाड़ियों में सीमित परिवार होने से लोग एक साथ बुढ़ा देव की पूजा करते थे। कालांतर में परिवार की संख्या में विस्तार होकर दूरदराज अलग-अलग गांवों कस्बों में व्यवस्थित होने के कारण अपनी सुविधानुसार अपने गांव तथा परिवार के वरिष्ठतम सदस्य वाले कुनबे के गांव में बूढ़ादेव स्थापित कर लिए, सुविधानुसार उसी कुल/परिवार के वरिष्ठतम सदस्य को विधान पूर्वक बूढ़ादेव स्थापित करने की पात्रता होती है बुढ़ा देव की पूजा कार्य के लिए पूजा पद्धति जानकर उसी कुल/कुनबा/परिवार के व्यक्ति को पुजारी का पदभार दिया जाता है तथा पूजा का कार्य संपन्न कराया जाता है। इस कार्य के लिए कुल का पूरा परिवार सहयोग करता है।




पृथ्वी की उत्पत्ति - प्रकृति की देन जो कि खगोलिय चुमबकीय गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा अपने कक्ष पर नाँचे से दाये अर्थात घड़ी की सूई के विपरित दिशा में (Anti clock vise) घुम रही है।

मानव की उत्पत्ति एवं मूल निवास- प्रकृति शक्ति, पंच महाभूत, पूना उन्ना(सल्ला-गागरा) शक्ति प्रथम, जेष्ठ, दाऊ-दाई(फरावेन-सईलांगर) की कोख से 35 करोड़ वर्ष पूर्व फड़ाकलडूबहिम महापरलय) के समय के समय सिरडीसिंगार द्वीप से उत्पत्ति, निवास स्थान कोयामुरी, सुनुनु द्रीप, सयुंगार द्वीप, गंडो द्रीप जिसे ट्रायेजिक युय में गोडवाना लैण्ड कहा जाता था । जहाँ बाद में आगंतुकों ने वहाँ के मूल निवासियों को मूलनिवासी, द्रविड आदिवासी, हरिजन, बहुजन संबोधित किया। गोंडवाना लेण्ड उष्ण प्रदेश था।

संबोधन

गणडवेन, गण्डजीव, गॉँड, दैबीर, कोया, कोयतूर

युग पुरुष-

शंभुशेक(महादेवों) की 88 पीढ़ी, पाहीदी पारी कुपार लिंगो रक्षेन्द्र राज दशानन ।


युग माता- 

कली कंकाली , रायताड़ जंगो, 88 शंभुओं की रानी (गौरा दाई नस्ल-रंग-ग्रेनाइट, स्लेटी (सांवला -कला) कद्- साधारण , नाटापन, गठीला बदन,

बाल- छोटे घुंघरालें, नाक- चपटी, बड़ी,


सामाजिक व्यवस्था

प्रकृति वादी नियमों एवं सिद्धांतों पर आधारित गोंदोलाई व्यवस्था (रीति-नीति, प्रथा-परंपरा, अलिखित)


आस्था के प्रतीक

देवी, देवता, निराकर स्वरुप।


उपासना स्थल

कुल देवालय (वंशाभिड़ी), ग्राम देवालय , गढ़ देवालय , कोट देवालय में केवल विशेष नियत तिथियों में देव कार्य।


सर्वोच्चय शक्ति

प्रकृति शक्ति-पंच महाभूत जिसे कोयतुर पितु शक्तिए एवं मातशक्ति प्ना


उन्ना) संल्ला-गांगरा) के रूप में देवाधिदेव बड़ा देव के रुम में पूजत है। कुल का प्रमुख देवी एवं देवता


गोंदोलाई व्यवस्था के अनुसार निर्धारित गोत्र के कुल का प्रथम पिता को उस कुल का बुढ़ा देव एवं उसक कुल की प्रथम माता जिससे उस कल के बच्चो की उत्पत्ति हुई उसे बुढ़ी माई माना जाता है।


कुल/वंश की पहचान -

 निर्धारित गोत्र, गोत्र उत्त्ति ढ़ गत् निह्ह, वंश टोटम, गोत्र बाना, निर्धारित संख्या में देवी देवता एवं निर्धारित गंग का ध्वज एवं फोटा (पगड़ी) होता है।


प्रमुख आराध्य देव-

 बड़ा देव, बुढा देव, दुल्हा दे, ठाकुर देव, लिंगो देव, करिया धुर्वा देव, नराईन देव, सांहड़ा देव, नागदेव।


1 बड़ा देव -

गोन्डी पुनेमी एवं गोन्डीगाथा के अनुसार सम्पूर्ण आदिवासी समुदाय देव संस्कृति का ध्योतक है। आदिवासियों के देवों का मूखिया "बड़ादेव है। वह श्रष्टि चिंतक है। देवों का देव बड़ादेव है, व निराकार व अजन्मा है। वह सर्वेच्च शाक्तिमान है, वह त्वों के उत्पत्किकरत है, वह कण-कण में विराजमान है, उसका साक्षात्कार देवों से होता है। वह प्रकृति के सभी शक्तियों से बड़ा है.

इस पुकराल एवं श्रष्टि में बड़ादेव से बड़ा कोई देव/शक्ति नहीं हैं।


गोड आदिवासी समाज गोंडी में बड़ादेव को 'सल्ले-गंगरा' शक्ति के नाम से स्तुति/सुमरन करता है, जिसका मतलब "धन एवं ऋण शक्ति से है इसी धनात्मक एवं ऋणात्मक शक्ति के जागुत/संयोग के कारण श्रष्टि के स्वरुप का निर्माण हुआ तथा इसी शक्ति के कारण ही श्रष्टि के समस्त संसाधनों का निर्माण, गुह-नक्षत्रों के संचलन की गति निर्धारित हई।

 उदाहरण स्वरुप 

चुम्बक मैं समाहित धन एवं क्रण शक्ति को मान सकते हैं, चम्बक के धन एवं त्रण शक्ति मं आकर्षण एवं प्रतिकर्षण होता है. यही आकर्षण एवं प्रतिकर्षण शक्ति ही गुरुत्वार्षण शक्ति है जो सम्पुर्णकाल में व्याप्त है। इसे उत्पत्ति व विनाश की शक्ति भी कहते हैं।


सल्ले-गंगरा की शक्ति पुर्वकाल के समस्त भौतिक-अभौतिक, चर-अचर,


जीव-निर्जीव, ठोस-तरल सभी में व्यापक रूप से विद्दमान है. सल्ले-गंगरा शाक्ति अर्थात "धन एवं ऋण" शक्ति ही "नर एवं मादा'"शक्तियां हैं, जिनके मातृत्व एंव पितृत्व गुणों से संतती उत्पन्न होते हैं। अर्थात उत्पत्ति की शक्ति ही सल्ले गंगरा या बड़देव है, संसाधनों की उत्पत्ति एवं अंत तथा जिवों का जन्म एवं मृत्यु प्रकृति के चक्रण का नियम है। जिसे हम जीवन चक्र या विज्ञान की भाषा में परिस्थितिक अथवा परिस्थितिकी तंत्र कहते हैं, अतः सृष्टि की उत्पत्ति एवं विनाश का स्वरूप तथा संपूर्ण पूर्वकाल की अनंत धन एवं ऋण शक्ति अथवा पितृत्व एवं मातृत्व शक्ति का ध्योतक बड़ादेव है।


बुढ़ा देव - 

देखने और सुनने में आता है की आदिवासी जन बड़ादेव और बुढ़ादेव को एक ही देव मान लेते हैं, बड़ादेव और बुढ़ादेव के ज्ञान, मान्यता और महत्ता मे बहुत बड़ा फर्क है। मानव में एक ही अंग की कमी/फर्क के कारण समाज उसे पुरुष नहीं मानता, उसी प्रकार बड़ा देव और बुढ़ा देव के स्थायित्व सांस्कारिक और अध्यात्मिक दर्शन में बहुत बड़ा फर्क है। बड़ादेव के संबंध में पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है। बड़ादेव आदि और अनंत शक्ति का ध्योतक है। जिसकी शक्ति का कोई सीमा नहीं। वह निराकार, सर्वशक्तिमान एम सर्वव्यापी है। वह पूर्वकाल सृष्टि के रचयिता है।

वह कण-कण में विराजमान हैं। देव देवियों पूर्वकाल सृष्टि एवं शरीर के प्रत्येक कण के अंत में बड़ादेव की शक्ति व्याप्त है। बड़ा देव से बड़ा और कोई देव/ईश्वर नहीं है। हमें बड़ा देव और बुढ़ा देव मैं अंतर को समझना होगा, अन्यथा हम अपने आने वाली पीढ़ी को इन की संरचना/स्थायित्व संस्कारित महत्व और अध्यात्मिक दर्शन का हस्तांतरण नहीं कर पाएंगे।

आदिवासियों की परंपरा अनुसार बूढ़ादेव सभी गोत्र/कुल/पुरखा/कुनबा का देव है, इससे प्रतीत के रूप में सिर्फ साजा झाड़ के मूल में स्थापित किया जाता है। सवाल अब यहां भी उठता है कि इसे साजा झाड़ में ही स्थापित क्यों किया जाता है, अन्य झाड़ों में क्यों नहीं? इसे घर में क्यों स्थापित नहीं किया जाता? उपरोक्त के संबंध में समाज की प्राकृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक दर्शनों की मान्यता है,की साजा का झाड़ तूफान बारिश भूमि कटाव की स्थिति में भी उसके जड़ अतिमजबूती से जमीन को जकड़े रखते हैं, जो उसकी हर कठिनाइयों की स्थिति में भी अधिकता और ठहराव की निशानी है,इसके मोटे बड़े आकार के पत्ते धूप और बारिश से भी जमीन का संरक्षण करते हैं इसके फल दुनिया के नक्शे की बनाई गई अंडाकार द्विध्रुवीय आकृति के समान दिखाई देता है। इस फल में ऊध्र्वाकार 5 कोर/धारिया विकसित होते हैं, इन पांच कोरो/धारियों के बनावट और संख्या में सृष्टि की पंचतत्व, गोंडवाना के 5 खंड भूभाग के सत्व-तत्व का दर्शन मिलता है। जो सृष्टि की उत्पत्ति जीवनचक्रण एवं जैवीकीय परिस्थितिकी के लिए पूर्ण है। इसलिए इसे सजा झाड़ के मूल में स्थापित किया जाता है। वर्तमान में वनों के विनाश और साझा झाड़ की उपलब्धता की कमी के कारण महुआ आदि शहरों में भी स्थापित किए जाते हैं।

            दूसरी मान्यता यहां है कि ऐसे आदिवासी जन घर पर ही बुढ़ादेव को स्थापित कर विधान पूर्वक पूजा करते थे। उसे भोग चढ़ाते थे, देवताओं के भोग और परिवार के लिए भोजन आज भी घर की मातृशक्ति ही तैयार करती है। तैयार भोजन सबसे पहले देवताओं को अर्पित किया जाता है, एक बार बूढ़ादेव के पूजा के दिन खाना बनाने वाले मातृशक्ति ऋतुचक्र (मासिक चक्र) शुरू हो गया। उन्हें इस समयावधि का ध्यान ही नहीं रहा, भोजन बन चुका था अब भोग लगाया जाताउसके पहले बूढ़ादेव को इस तथ्य का अंतर्ज्ञान हो जाने के कारण वे भूखे कार्य से लोगों का ध्यान हटाने के लिए घर से बाहर चले गए लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि बूढ़ादेव घर से बाहर क्यों चले गए परिवार स्कूल कुनबा के लोगों ने उन्हें समझाने का प्रयास किया परंतु अंततः वह घर वापस नहीं आए और पास में स्थित साजा झाड़ के नीचे बैठकर लोगों की सृष्टि में अंश श्रृजन के पूर्व प्रक्रिया (मातृशक्ति रितु परिवर्तन की मानव संस्कारित जीवन में महत्ता)/घटना चक्र पर सार्थक उपदेश दिया,तभी से बूढ़ादेव को घर के बाहर साझा झाड़ के नीचे ही भोग लगाया जाता है।इस घटना और उनके उपदेशों के पश्चात 

बूढ़ादेव के भोग तथा को नंबर को खाना खिलाने के लिए पुरुष ही खाना बनाते हैं मातृशक्ति या नहीं आज भी गोंड आदिवासी समाज में मात्र शक्तियां ऋतु परिवर्तन की समयावधि तक भोजन नहीं बनाती, रसोई और पेन-पाठा में भी प्रवेश नहीं करती। मात्र शक्तियों में ऋतु परिवर्तन की प्रक्रिया 3-5 दिन में पूरी होती है। इस अवधि में घर के पुरुष सदस्य या दूसरे सदस्य खाना बनाते हैं, इस अवधि तक परिवार के प्रधान सदस्य किसी दूसरे कुनबे या परिवार के शुभ कार्य में शामिल नहीं होते, इस अवधि में ब्रम्हचर्य का पालन किया जाता है।

       गोत्र सदाबहार कुलदेव बूढ़ादेव की स्थापना के पूर्व निश्चित स्थान पर विधान पूर्वक साझा का पौधा रोपण किया जाता है, या प्राकृतिक रूप से विकसित पौधों को चिन्हांकित कर लिया जाता है। उसके पश्चात धार्मिक विधि-विधान से बूढ़ादेव को स्थापित किया जाता है।बुढ़ा देव स्थापित सजा के झाड़/पेड़ को किसी भी रूप से नुकसान पहुंचाना या काटना पूर्ण रूप से वर्जित है। यदि कोई जानबूझ के उसे नुकसान पहुंचाता है या काटता है तो उसे जीवन में भारी कलर्स का सामना करना पड़ता है आज भी इस बात की सत्यता को झुठलाया नहीं जा सकता।

        आदिवासी जनों की मान्यता है कि इस देव परंपरा/संस्कृति मे बूढ़ादेव उनके कुल/गोत्र कुनबा का पहले व्यक्ति हैं, जो बूढ़ा होकर अपना भौतिक देह त्याग चुका है। उसकी जीवात्मा को अपने कुल/कुनबा/पूर्वज/देव के रूप में साजा के झाड़ के मुल मे स्थापित कर दिया गया।उस पहले व्यक्ति से लेकर अब तक अपने भौतिक स्वरूप को त्यागने वाले कुल कुटुंब परिवार के प्रत्येक सदस्य की जीवात्मा को धार्मिक विधि-विधान पूर्वक स्थापित कर दिया गया है एवं यहां निरंतरता अनंत काल तक चलती रहेगी।


        गोंड आदिवासी के कुल-गोत्र/कुनबा/कुटुंबवार अलग-अलग बूढ़ादेव स्थापित किए जाते हैं, किंतु पूजा विधि-विधान विधान समान होता है। गोत्र एवं देव सगा संख्या अनुसार आत्माओं को भोग दिया जाने हेतु साजा के पत्तों में हिस्से रखकर उन्हें सुमिरन करते हुए सभी हिस्सों से 5-5 निवाले अर्पित किए जाते हैं।इस देव सगा संख्या के आधार पर गोत्र अनुसार परिवार को अपने ही गोत्र/कुल/कुटुंब के अन्य स्थान पर रखने वाले परिवार/कुल/गोत्र सगा के बूढ़ादेव में अपने पूर्वजों को शामिल कर सकता है, बशर्ते वह उसी कुल/गोत्र देवसंख्या का सगा हो।

जैसे परतेती गोत्र का पांच देव सगा दुनिया के किसी अन्य स्थान पर रहने वाले परतेती गोत्र वाले पांच देव सगा के बूढ़ादेव पेनठाना में शामिल होकर अपने परिवार के पूर्वजों को विधान पूर्वक शामिल कर सकता है।

पूर्व के देवगढ़ गाड़ियों में सीमित परिवार होने से लोग एक साथ बुढ़ा देव की पूजा करते थे। कालांतर में परिवार की संख्या में विस्तार होकर दूरदराज अलग-अलग गांवों कस्बों में व्यवस्थित होने के कारण अपनी सुविधानुसार अपने गांव तथा परिवार के वरिष्ठतम सदस्य वाले कुनबे के गांव में बूढ़ादेव स्थापित कर लिए, सुविधानुसार उसी कुल/परिवार के वरिष्ठतम सदस्य को विधान पूर्वक बूढ़ादेव स्थापित करने की पात्रता होती है बुढ़ा देव की पूजा कार्य के लिए पूजा पद्धति जानकर उसी कुल/कुनबा/परिवार के व्यक्ति को पुजारी का पदभार दिया जाता है तथा पूजा का कार्य संपन्न कराया जाता है। इस कार्य के लिए कुल का पूरा परिवार सहयोग करता है।



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दंतेश्वरी मंदिर: आस्था, इतिहास और आदिवासी संस्कृति का संगम छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के दंतेवाड़ा जिले में स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर भारत के सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, गोंडवाना परंपरा और बस्तर की ऐतिहासिक पहचान का केंद्र भी है। यहां शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर स्थित यह मंदिर आध्यात्मिक ऊर्जा, प्राकृतिक शक्ति और सांस्कृतिक विरासत का अनोखा संगम प्रस्तुत करता है। दंतेश्वरी मंदिर का इतिहास दंतेश्वरी मंदिर का निर्माण लगभग 14वीं शताब्दी में बस्तर के काकतीय शासकों द्वारा कराया गया था। माना जाता है कि जब काकतीय वंश के राजा वारंगल से बस्तर आए, तो वे अपनी कुलदेवी दंतेश्वरी को भी साथ लाए। शक्ति पीठ से संबंध पुराणों के अनुसार: माता सती के शरीर के अंग जहां-जहां गिरे, वहां शक्ति पीठ बने। दंतेवाड़ा में माता का दांत (दंत) गिरा था। इसी कारण इस स्थान का नाम पड़ा – दंतेवाड़ा और देवी का नाम हुआ दंतेश्वरी। यह मंदिर आज भी बस्तर राजपरिवार की कुलदेवी के रूप में पूजित है। --- आदिवासी आस्था और गोंडवाना संब...

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  आदिवासी होली कैसे मनाते है ? इतिहास एक ऐसा सच है जो हमने कभी देखा नहीं है लेकिन यह चीज हमें स्वीकार नी पड़ती है। इतिहास हमें अपने जीवन में बहुत कुछ सिखाता है और भविष्य की कल्पना करने में मदद करता है। वैसे ही कुछ हम आपको पुराना इतिहास बताते हैं जो करोड़ों साल पुराना है। वैसे तो हम अपनी भारतीय संस्कृति के अनुसार होलिका को जलाते भी है और अगले दिन होली खेलते भी है। लेकिन यहां   हमारे आदिवासियों में मान्यता अलग हैं। आज आप जानेंगे कि आदिवासी होली कैसे मनाते हैं? होली के बारे में आदिवासियों की विचारधारा आज हम आपको होली त्योहार से जुड़ी आदिवासियों की विचारसरणी के बारे में बताएंगे। कुछ आदिवासियों का मानना है कि होली जलाना भी बहुत बड़ा पाप है! शायद आपको यह जानकर हैरानी होगी और यह लेखन भी बहुत ही खास है की आदिवासी होली कैसे मनाते हैं? भारत के अंदर कई सारे ऐसे आदिवासी है जो आज भी अपने कोयातुर समाज के विधि-विधान का पालन करते हुए। आज भी होली पर्व मनाते है। लेकिन आज के समय में जिस प्रकार से होली के बारे में कथा कहानी में बताया व पढ़ाया जाता है। इस प्रकार कदापि नही है। क्योंकि जब से हम...

गोंडी व्याकरण, गोडवाना भाषा सिखें|

जय सेवा सागा जनो ,       कुछोडों सैल प्रथम पृथ्वी का निर्माण हुआ, जो आगे चलने दो महाद्वीप में हुआ था, जैसा दो महाप्रलय का निर्माण, एक था यूरेशिया और दूसरा था गोंडवान महाप्रलय ये जो गोंडवाँ महाप्रपात एक महाप्रलय था| यह प्राचीन काल के प्राचीन महाप्रलय पैंजिया का दक्षिणी था| उत्तरी भाग के बारे में यह बताया गया| भारत के महाद्वीप के आलावा में महाद्वीप गो और महाद्वीप, जो मौसम में उत्तर में है, का उद्गम स्थल| आज से 13 करोड़ साल पहले गोंडवांस के वायुमंडलीय तूफान, अंटार्टिका, अफ़्रीका और दक्षिणी महाप्रलय का निर्माण |       गोंडवाना नाम नर्मदा नदी के दक्षिण में प्राचीन गोंड राज्य से व्युत्प्न्न है, गोंडवाना नाम का सबसे पहला विज्ञान है | से गोंडिय़ों की भाषा का उद्गम था|          गोंडी भाषा में भारत के एक बड़े आकार का है| जैसा आज की दुनिया में लागू होने वाली भाषा के साथ लागू होने वाली भाषा में जलवायु परिवर्तन की भाषा पर लागू होता है, अगर कोई वैरिएंट दुनिया में लागू होता है, तो संस्कृति, सभ्यता, भाषा, धर्म, कुछ भी लागू होता है| भाषा शब्द शब्द क...