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गोंडी और गोंडवाना कोयापूनेर साम्राज्य के पतन का असली कारण क्या है ?

 कोयापुनेम का ब्राह्मणीकरण ही गोंडी और गोंडवाना साम्राज्य के पतन




कोयापुनेम, बौद्ध या जैन धर्म की तरह एक श्रमण परम्परा  का मानव धर्म है जिसमें हमेशा प्रकृति को प्राथमिकता दी गयी है और मानव को प्रकृति के साथ सम्मान और समर्पण के साथ सामंजस्य रखने को सलाह दी गयी है !


कोयापुनेम दुनिया का एकमात्र ऐसा धर्म है जो प्रकृति में व्याप्त धटनाओं पर आधारित है और कुछ भी ऐसा कुछ भी  स्वीकार नहीं करता जिनमें मानवीय हस्तक्षेप हो ! 

कोयापुनेम न तो आस्तिक और न ही नास्तिक बल्कि वास्तविक धटनाओं को प्राथमिकता देता है ।


पूरा का पूरा कोयापुनेम सच्ची प्राकृतिक व्यवस्था पर आधारित है जो कुछ प्रकृति में स्वतः हो रहा है बस उसी को पालन करना सिखाता है और उसी  साथ सामंजस्य बिठाना सिखाता है। प्राकृतिक स्रोतों और घटनाओं के आस पास ही मानव जीवन की उत्पत्ति, विकास, सार्थकता और सफलता नियत होती है ।


कोयापुनेम को मानव जीवन के क़रीब लाकर पारी पहांदी कुपार लिंगो ने इस धरती पर मानवीय मूल्यों को प्रकृति से जोड़कर देखा और बताया की मानव भी इसी प्रकृति का एक छोटी सी इकाई है । मानव की संरचना और व्यवहार प्रकृति की संरचना और व्यवहार का ही एक छोटा स्वरूप होता है। 


जिस मात्रा में प्रकृति में अवयव हैं ठीक उसी मात्रा में मानव शरीर में भी अवयवो का प्रतिशत है उदाहरण के तौर पर पानी की मात्रा और खनिज लवणों की मात्रा।

इसी प्रकृति से मानव निर्मित होता है और अपना कार्यकाल पूरा करके पुनः इसी प्रकृति का हिस्सा बन जाता है । जिस फड़ापेन  से मानव की उत्पत्ति होती है उसी फड़ापेन में उसका पुनः विलय भी होता है ।


कोयापुनेम किसी आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग, नर्क , भगवान,  परलोक, आडंबर इत्यादि में विश्वास नहीं करता है।आर्यों  के आगमन से पूर्व गोंडवाना लैंड पर केवल कोयापुनेम था लेकिन इसका पतन भारत में आर्यों के आगमन से शुरू हुआ और आजतक बदस्तूर जारी है और अगर जनजातीय लोग अब भी न चेते तो कोयापुनेम का भी हस्र भारत के अन्य श्रमण धर्मों जैसे बौद्ध और जैन की तरह हो जाएगा ।


इसी ब्राह्मणीकरण के कारण बौद्ध धर्म भारत से लगभग विलुप्त हो चुका है और जैन धर्म का पूर्ण रूप से हिंदू धर्म में समाहित हो चुका है लेकिन कोयापुनेम आज भी विभिन्न जन जातीय समुदायों में आज भी विधमान है और ब्राह्मणी धर्म के समानांतर अपनी उपस्थिति बनाए हुआ है  भले ही आम लोगों को इसका एहसास न हो और आजके ब्राह्मणी धर्म के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा है ।


रामायण काल  से लेकर वर्तमान काल तक पूरा ब्राह्मणी धर्म इसी कोयापुनेम को ख़त्म करने या इस पर विजय पाने की कोशिश करता रहा है लेकिन कभी भी पूर्णरूपेण सफल नहीं हुआ ।


गोंडी भाषा जो की एक बहुत ही प्राचीन भाषा है यहाँ तक कि संस्कृत और हिंदी के कई शब्द इसी भाषा से चुराए गए हैं लेकिन बिडंबना देखिए जिस भाषा से सैकड़ों नई भाषायें जन्मी आज उसी का अस्तित्व ख़तरे में है । संस्कृत की पाठशालाएँ, उर्दू के मदरसे, अंग्रेज़ी के स्कूल आज भी धड़ल्ले से चल रहे हैं लेकिन गोंडी भाषा के शिक्षा केंद्र - ‘गोटुल’ कब के विलुप्त हो चुके हैं । 


सोचिए जिस भाषा के गोटुल सैकड़ों वर्ष पहले ही ख़त्म हो गए हों फिर भी अगर वो भाषा आज ज़िंदा है तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उसका प्रभाव पूर्व में कितना अच्छा रहा होगा। गोंडी आज भी मध्य और दक्षिण भारत के गावों और जंगलों में बची है और लाखों लोग आज भी गोंडी को जीवित रखे हुए हैं ।


आज का कोयतूड़ गोंडी पढ़ना लिखना या समझना नहीं चाहता और अपने संस्कारों,  रीति रिवाजों, धार्मिक सांस्कृतिक उत्सवों में भी गोंडी को त्याग दिया है या हिंदी गोंडी मिश्रित शब्दों को इस्तेमाल करने लगा है और इन्हें गोंडी के बिगड़े स्वरूप को असली गोंडी मानने लगा है ।

जैसे फड़ापेन गोंडी का शब्द है जिसका विस्तृत व्याख्या है । 


फडापेन ठाना में पाँच सबसे बड़ी शक्तियों का  समूह होता है जैसे

 १. भूटिया पेन (मिट्टी) 
२. माटिया पेन (वायु ) 
३. उमोटिया पेन (पानी) 
४. अड्डितियापेन (आग) 
५. अगाटिया पेन(आकाश) 


लेकिन हिंदी में इसे आज इन्हें बड़ादेव या बूढ़ादेव या बूढ़ाल देव या अन्य देव कहकर इसका मूल स्वरूप ही बिगाड़ दिया गया है।यहाँ तक कि लोग इस फड़ापेन को मूर्ति का रूप भी दे चुके हैं और कुछ लोग एक क़दम आगे बढ़कर इनको शंकर या शिव के रूप में स्थापित कर चुके हैं ।आजकल आप आसानी से शक्ति स्थानों (ठाना) में फड़ापेन के रूप में स्थापित मूर्तियाँ और प्रतीक देख सकते हैं।


क्या कभी आपने ने सोचा है कि फड़ापेन ( आग पानी हवा मिट्टी और आकाश ) को मूर्ति के रूप में रखा जा सकता है या व्यक्तिवादी बनाया जा सकता है? कभी नहीं। ये प्राकृतिक शक्तियाँ हमारे आसपास और हमारे शरीर में हमेशा मौजूद होती हैं और बस इनका हेत(आह्वान) करके इनसे अपने आपको शक्तिशाली बना सकते हैं ।


जिस तरह से कुछ जनजातीय लोग ब्राह्मणीकरण का झंडा था


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